Monday, August 15, 2016

मुश्किल बहुत है

जानता  हूँअब वो मेरा नहीं,
मगर दिल को समझाना मुश्किल बहुत है।

साथ जिनके चले हैं बरसों तक,
बगल से चुपचाप गुजर जाना मुश्किल बहुत है।

जिनसे लिपटे रहें हैं क़बा की तरह, 
मुस्कुरा कर हाथ मिलाना मुश्किल बहुत है। 

वक़्त क्या मोड़ लाया है,
साथ रहना मुनासिब नहीं और दूर जाना मुश्किल बहुत है। 


Sunday, July 31, 2016

ढूंढने लगा हूँ खुद को दर-ब-दर

ढूंढने लगा हूँ खुद को दर-ब-दर,
साथ उनसे मेरा छूट जाने के बाद।

बढाती रही है तेरी कीमत मेरी नज़रों में,
जब भी मिला किसी और से तेरे जाने के बाद।

यूं तो लोग बार-बार मारतें हैं एक जिंदगी में,
कुछ ज़िंदा हो जाते है मर जाने के बाद।

उम्र भर जीता रहा ज़िन्दगी के नाम पर,
जान पाया जिंदगी, गुजर जाने बाद।

नादाँ परिंदे भूल बैठे हैं फ़लक की गोद में,
आना है कश्तियों पर तूफानों के बाद।

कभी मौका कभी मर्जी, कातिल बने मेरे

कभी मौका कभी मर्जी,  कातिल बने मेरे।

दुनिया निभाने में किस ओर आ निकला
कभी कांटे कभी पत्थर मंज़िल बने मेरे।

आँखों का बहम टूटा जब किनारे ही बहगये
कभी तूंफा कभी दरिया साहिल बने मेरे।

ओ आज भी मसहूर हैं औरों की बज़्म में
पैमाने, कभी मैखाने महफ़िल मेरे।   

हाथ में आइना नहीं था

उसने  रोका  नहीं खुद को
वरना आदमी बुरा नहीं था।

शायद मेरी ही गलती थी
वो बेवफा नहीं था।

बेवज़ह मैं बनगया था नाखुदा,
वो मेरा कारवां नहीं था।

मेरा वक़्त बुरा है शायद,
वरन वो मेहरवान नहीं था।

ऐसा नहीं के बाग उसने लगाये थे,
वैसा बगवान नहीं था।

"अहसास" कैसे होता गलती का ?
हाथ में आइना नहीं था।


कोई दूसरे को, क्या जान पाये

निकल पड़े हैं जो, खुद की मंज़िल बनाने,
उन्हें और क्या कोई रास्ता दिखाए।

जिन्हें फ़र्ज़ से हो गयी हो मुहब्बत,
उन्हें इश्क़ कैसे निकम्मा बनाए।

बड़ी बात है, खुद को जान लेना,
कोई दूसरे को, क्या जान पाये।  

Saturday, July 30, 2016

हर तरफ बिखरें हैं पन्ने तेरी किताब के

हर तरफ बिखरें हैं पन्ने तेरी किताब के,
किस-किस को समेटूं ज़िन्दगी तेरे हिसाब से।

बहुत मुश्किल है तुझसे रूबरू होना,
बहुत मुश्किल है बचपाना तेरे लिबास से।

मेरी ख़ामोशी बुज़दिली नहीं,
रिश्ते टूट भी सकते हैं सवालों के जबाब से।

खामोश गुजरता हूँ उसकी गलियो से,
लोग शोर मचा देते हैं मेरे जाने के बाद से।

यूं तो चराग भी काफी है रास्ता दिखने के लिए,
वरना क्या फर्क पड़ता है आफताब से।



ये सोचा नहीं था

मंज़िल यूं बस गयी थी निगाह में,
मोड़ इतने मिलेंगे ये सोचा नहीं था।

मुहब्बत की चाहत थी मेरी भी जायज़,
दर्द इतने मिलेंगे ये सोचा नहीं था।

इब्तिदा मेरी इमारत का, जब इबादत इल्म से हुआ,
अकबर बनेंगें अख्ज़ मेरे, ये  सोचा नहीं था,